أنتحار




اشتهيتُ المسدسْ...
طلقةٌ..
 تُحررُ الروحَ من جسدي..
تُبعثرُ الذكرى..
 غباراً...
وتنثُرها ..
و ينهزمُ الخلودْ..
أنا ..
 اشتبقتُ لذةَ إنتحاري...
أحببتُها...
ودتتُ أن اكسرَ..
 كل أنكساري...
وأن أمحو ..
من تاريخِ كينونتي ..
كل ذكرى موثقة ..
بفكري..
أو الوجود..

رتبتُ انتحاري ..
لمعتُ جذعَ مسدسي ..
دللتهُ..
واعتصرتُ بكلِ إشتياقٍ ..
 صدرَ الرصاصةَ ..
- تُرى -
  أيكون لي في موتي لذةٌ..؟؟
أم ألمٌ..
 يجتثُ جُلَ أوصالي ..؟؟
لا فرقَ عندي ..!!
بين الهاجسينِ ..
فأنا ..
قد عشقتُ مسدسي..
وتلاصقا بكل إمتنانِ ..
زندي ..
وزندهُ...
ضدانِ نحنُ ..
في لحظةٍ..
 قرب انتهائي...

غريبةٌ جداً ..
فلسفةُ الإنتِحارْ..
فحين أعتليتُ القرارْ..
تغيرتْ سِماتُ الأشياءِ حولي..!!
أبتسم القمرْ.. !!
انحنى الزهرُ..
 ودعني .. ورحلْ !!
أرتعشَ الجدارْ..!!
إنسجَمت قُربَ الرصاصة..
كلُ صدماتي!!
تخبأت .. خلف الستارْ..!!
كل ما في الكونِ حولي ..
 يدعوني لأنتظرْ..!!
إلا البشر...!!
صفَقوا ..
قليلاً لدمعي ..
وقليلاً لُجرحي ..
وصفَقوا ..
بكل إنتشاءٍ..
و بكل إحتفاءٍ..
لمُسدسي..
نجم التألقِ ..
لفصلِ ..
الأغاني الحزينة..
"
فُصلُ إنتمائي لذاتي..
وصمتُ الليالي..
وغدرُ وفائي ..
بصدقِ الضميرْ..
ووهنُ خطاي..
 وضيقُ الطريق..
وطعني..
 لقلبي ..
وذرفي لدمعي..
وطولُ الرحيل..
"


هدهتُه مُسدسي..
صمتُ ...
مسحتُ هيكلهُ ..
كخصرِ أمرأتي المُثير ..
قبلتهُ..
قبلةَ .. وداعي الأخيرْ ..
وبلهفةٍ ..
لصدغي ضممته..
برفقٍ..
 زنادي سحبته..
فودعتُ..  قلبي..
حزيناً وجدته ..
كفكفتُ دمعي..
غزيراً رأيته..
وصدري ..
يموجُ بوجعٍ عميقْ..
وداعاً .. يا تعبي..
وداعاً.. يا همي..
وداعا .. يا حزني..
وداعاً .. يا ضعفي..
وتباً إليكَ ..
 شرقي .. الضميرْ..
صمتٌ..  يسودُ..
صمتٌ .. يكونُ..
وأني بصدقٍ..
بحقدي ..
بكرهي..
بصدقٍ .. بصدقٍ..
مللتُ الوجودْ..

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